Tuesday, January 10, 2017

घरेलू हिंसा पर कानून – Domestic Violation Law

घरेलू हिंसा की जड़ें हमारे समाज तथा परिवार में गहराई तक जम गई हैं। इसे व्‍यवस्‍थागत समर्थन भी मिलता है। घरेलू हिंसा के खिलाफ यदि कोई महिला आवाज मुखर करती है तो इसका तात्‍पर्य होता है अपने समाज और परिवार में आमूलचूल परिवर्तन की बात करना।
प्राय: देखा जा रहा है कि घरेलू हिंसा के मामले दिनों-दिन बढ्ते जा रहे हैं। परिवार तथा समाज के संबंधों में व्‍याप्‍त ईर्ष्‍या, द्वेष, अहंकार, अपमान तथा विद्रोह घरेलू हिंसा के मुख्‍य कारण हैं। परिवार में हिंसा की शिकार सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि वृद्ध और बच्‍चे भी बन जाते हैं।
प्रक़ति ने महिला और पुरूष की शारीरिक संरचनाएं जिस तरह की हैं उनमें महिला हमेशा नाजुक और कमजोर रही है, वहीं हमारे देश में यह माना जाता रहा है कि पति को पत्नि पर हाथ उठाने का अधिकार शादी के बाद ही मिल जाता है। इसी तारतम्‍य में वर्ष 2006 में भारत में घरेलू हिंसा से पीडित महिलाओं, बच्‍चों अथवा वृद्धों को कुछ राहत जरूर मिल गयी है।
घरेलू हिंसा की परिभाषा
पुलिस – महिला, वृद्ध अथवा बच्‍चों के साथ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा अपराध की श्रेणी में आती है। महिलाओं के प्रति घलेलू हिंसा के अधिकांश मामलों में दहेज प्रताड़ना तथा अकारण मारपीट प्रमुख हैं।
राज्‍य महिला आयोग – कोई भी महिला यदि परिवार के पुरूष द्वारा की गई मारपीट अथवा अन्‍य प्रताड्ना से त्रस्‍त है तो वह घरेलू हिंसा की शिकार कहलाएगी। घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 उसे घरेलू हिंसा के विरूद्ध संरक्षण और सहायता का अधिकार प्रदान करता है।
आधारशिला (एन.जी.ओ.) – परिवार में महिला तथा उसके अलावा किसी भी व्‍यक्ति के साथ मारपीट, धमकी देना तथा उत्‍पीड़न घरेलू हिंसा की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा लैंगिक हिंसा, मौखिक और भावनात्‍मक हिंसा तथा आर्थिक हिंसा भी घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं।
(पुलिस, राज्‍य महिला आयोग तथा एन.जी.ओ. द्वारा घरेलू हिंसा की जो परिभाषाएं दी गई हैं उनका तात्‍पर्य लगभग एक जैसा ही है हालांकि भाषा परिवर्तित है।)
घरेलू हिंसा- विश्‍व की स्थिति
महिलाओं को अधिकारों की सुरक्षा को अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दशक (1975-85) के दौरान एक पृथक पहचान मिली थी। सन् 1979 में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में इसे अंतर्राष्‍ट्रीय कानून का रूप दिया गया था। विश्‍व के अधिकांश देशों में पुरूष प्रधान समाज है। पुरूष प्रधान समाज में सत्‍ता पुरूषों के हाथ में रहने के कारण सदैव ही पुरूषों ने महिलाओं को दोयम दर्जे का स्‍थान दिया है।
यही कारण है कि पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं के प्रति अपराध, कम महत्‍व देने तथा उनका शोषण करने की भावना बलवती रही है। ईरान, अफगानिस्‍तान की तरह अमेरिका जैसे विकासशील देश में भी महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्‍यवहार किया जाता है। अमेरिका में एक नियम है, जिसके अनुसार महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्‍यवहार किया जाता है। अमेरिका में एक नियम है, जिसके अनुसार यदि एक परिवार में मॉं और बेटा है तो वे एक ही शयन कक्ष के मकान के हकदार होंगे।
इससे स्‍पष्‍ट है कि अमेरिका जैसे देश में भी महिलाओं के प्रति भेदभाव किया जाता है। दुनिया के सबसे अधिक शक्तिशाली व उन्‍नत राष्‍ट्र होने के बावजूद अमेरिका में अनेक क्षेत्रों में महिलाओं को पुरूषों के समान अधिकार प्राप्‍त नहीं हैं।
भारत में घरेलू हिंसा – Domestic Violation in India
दिल्‍ली स्थित एक सामाजिक संस्‍था द्वारा कराये गये अध्‍ययन के अनुसार भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है। इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं।
घरेलू हिंसा के प्रमुख कारण
पालन-पोषण में पितृसत्‍ता अधिक महत्‍व रखती है इसलिए लड़की को कमजोर तथा लड़के को साहसी माना जाता है। लड़की स्‍वातंत्र्य व्‍यक्तित्‍व को जीवन की आरम्‍भ अवस्‍था में ही कुचल दिया जाता है।
घरेलू हिंसा के प्रमुख कारण निम्‍न माने जाते हैं
1.  समतावादी शिक्षा व्‍यवस्‍था का अभाव।
2. महिला के चरित्र पर संदेह करना।
3. शराब की लत।
4. इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का दुष्‍प्रभाव।
5. महिला को स्‍वावलम्‍बी बनने से रोकना।
घरेलू हिंसा का दुष्‍प्रभाव
महिलाओं तथा बच्‍चों पर घरेलू हिंसा के शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्‍मक दुष्‍प्रभाव पड़ते हैं। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्‍तों और आस-पड़ौस के साथ रिश्‍तों व बच्‍चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्‍प्रभाव देखा जा सकता है
घरेलू हिंसा के कारण देहज मृत्‍यु, हत्‍या और आत्‍महत्‍या बढ़ी हैं। वेश्‍यावृत्ति की प्रवृत्ति भी इसी कारण बढ़ी है।
महिला की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा होती है। महिलाओं का कार्य क्षमता घटती है, सा‍थ ही वह डरी-डरी भी रहती है। परिणामस्‍वरूप प्रताडि़त महिला मानसिक रोगी बन जाती है जो कभी-कभी पागलपन की हद तक पहुंच जाती है।
पीडित महिला की घर में द्वितीय श्रेणी की स्थिति स्‍थापित हो जाती है।
पुलिस की भूमिका
घरेलू हिंसा के प्रकरणों में कई बार पुलिस द्वारा एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जाती, सिर्फ रोजनामचे में लिखा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रताडित महिलाओं को एफ.आई.आर. की नकल नहीं दी जाती। मांगने पर अकारण परेशान किया जाता हैं। आंकडे बढ़ जाएंगे इस कारण प्रकरण पंजीबद्ध करने से पुलिस बचती है।
पति द्वारा महिलाओं को पीटने अथवा मानसिक यंत्रणा देने को पुलिस बड़ा मुद्दा नहीं मानती। अक्‍सर उसका कहाना होता है कि ‘पति ने ही तो पीटा है ऐसी क्‍या बात हो गई, पति मारता है तो प्‍यार भी करता है।‘ यह कहकर पुलिस प्रताडित महिला को टाल देती है। चूंकि महिला की शारिरिक चोट पुलिस को दिखाई नहीं देती इसलिए भी वह उसे गंभीरता से नहीं लेती।
थाने में सिर्फ एक यो दो महिला सिपाही पदस्‍थ की जाती हैं। महिला या घरेलू हिंसा से संबंधित प्रकरणों में प्राय: उनका हस्‍तक्षेप कम कर दिया जाता है, क्‍योंकि उनका अधिकारी सहित बहुमत पुलिस का है। यही कारण है कि महिला पुलिसकर्मी भी घरेलू हिंसा की शिकार महिला की ज्‍यादा मदद नहीं कर पाती हैं। कई बार तो उनका ही शोषण कर लिया जाता है।
थाना स्‍तर पर संवेदनशील लोग नहीं हैं।
पुलिसकर्मी रिश्‍वत लेकर प्रताडित महिला को समझौते के लिए विवश करते हैं अथवा प्रकरण को कमजोर कर देते हैं।
पुलिस का कहना होता है कि दहेज तथा घरेलू हिंसा के झूठे प्रकरण ही अधिक होते हैं।
डाकन, नाता आदि मानसिक यंत्रणाओं के मुद्दे पर पुलिस असंवेदनशील है। पुलिस का कहना है कि यह सामाजिक मुद्दा है, पुलिस का नहीं।
98, मामले में पुलिस बिना किसी प्रशिक्षित पारिवारिक परामर्शदाता के सलाह देती है अथवा समझौता करा देती है। न तो इस समझौते में घटना का ब्‍यौरा होता है और न ही पति द्वारा यह लिखाया जाता है कि भविष्‍य में वह ऐसा नहीं करेगा।
परिवार व अन्‍य अदालतें
महिलाओं को उत्‍पीड़न से मुक्ति दिलाने अथवा दोषियों को उपयुक्‍त सजा दिलवाने के लिए पारिवारिक अदालतों का गठन सन् 1984 में किया गया था। तब यह माना था कि अब महिला को घरेलू हिंसा से राहत मिल जाएगी।
इन अदालतों में कहा जाता है कि वकील की जरूरत नहीं है पर सारे कागज वकील ही बनाते हैं और हर समय जज यही कहते हैं कि तुम्‍हारे वकील कहां हैं ? उनको लाओ। यह एक बड़ा विरोधाभास है, इन अदालतों की कथी और करनी में।
सोचा गया था कि इन अदालतों में मामले जल्‍दी निबट जाएंगे पर इनमें भी समय बहुत लगता है।
गुजारा भत्‍ता के आदेश हो जाते हैं पर उनका पालन नहीं होता।
इन अदालतों में गवाहों पर बहुत जोर रहता है। पीडि़ता के लिए गवाह जुटाना मुश्किल होता है।
अदालत में जो काउंसलर लगे हुए हैं उनके चयन में पारदर्शिता नहीं है। वे अपने विषय के विशेषज्ञ भी नहीं हैं।
पारिवारिक अदालतों के मामलों को लकर कोई अध्‍ययन नहीं हुआ है कि वहां प्रताडित महिलाओं को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
अच्‍छे वकील फीस अधिक मांगते हैं इस कारण पीडित महिलाओं को बहुत दिक्‍कत होती है।
जाति पंचायतें
परिवार-समुदायों, समुदायों की जाति पंचायतों का गांव में अधिक और शहरों में कम प्रभाव है। इनसे जातिवाद बढ़ा है। यह पंचायतें महिलाओं के हक में नहीं हैं।
इन अदालतों में प्राय: प्रताडि़त महिलाओं को नहीं बुलाया जाता बल्कि उनके बारे में एक पक्षीय निर्णय ले लिया जाता है। हर जगह पुरूष प्रधान जाति पंचायतें ज्‍यादा हैं।
जहं/महिलाओं की संस्‍थाएं सक्रिय नहीं हैं वहां तो घरेलू हिंसा को लेकर हुए फैसले पूरी तरह एक पक्षीय रहे हैं।
हस्‍तक्षेप कैसेट हो
शिक्षा संस्‍थाओं में छात्राओं को खुलकर शिक्षा देना चाहिये ताकि वे घरेलू हिंसा की शिकार न हों। उन्‍हें काउंसिलिंग तथा कानूनी ज्ञान की जानकारी देना उचित होगा।
गांव में यह पता लग जाता है कि किसके घर में समस्‍या चल रही है। शहर में यह पता नहीं लगता है इस कारण वहंा हर स्‍तर पर बात करने की आवश्‍यकता है। शहर में समस्‍याग्रस्‍त महिलाओं के संदर्भ में पुरूषों पर काउंसलिंग का असर नहीं होता। इसी कारण पुरूष छात्रों  के साथ भी काउंसिलिंग का सिलसिला स्‍कूल-कालेज के स्‍तर से ही शुरू हो जाना चाहिये।
शिक्षा के साथ-साथ लड़कियों में आत्‍मविश्‍वास पैदा हो, ऐसा प्रयास करना चाहिये। यह काम शिक्षकों का है। शिक्षकों के प्रशिक्षण में इस मुद्दे को शामिल किया जाना चाहिये।
सम्‍पत्ति में लड़कियों को पूरा अधिकार होना चाहिए घर का वातावरण लड़की को आत्‍मविश्‍वासी बनाता है। उसको मजबूत करने की आवश्‍यकता है।
पुलिस का हस्‍तक्षेप
पुलिस की भूमिका काफी संवेदनशील बनाने की आवश्‍यकता है। उनकी ट्रेन में घरेलू हिंसा एवं महिला संवेदनशीलता को विशेष रूप से शामिल किया जाना चाहिये।
प्रत्‍येक थाने पर प्रतिमाह ‘समस्‍या समाधान शिविर’ आयोजित करने का आदेश निकल चुका है पर उसकी किसी को भी जानकारी नहीं है। इसका व्‍यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहियेा इसका दिन व समय तय होना चाहिये। अखबार/रेडियो/दूरदर्शन पर प्रचार होना चाहिये।
थान स्‍तर पर काउंसलर हों। विशेष रूप से घरेलू हिंसा के मामलों में पुलिस जब समझौता कराती है तो एक प्रशिक्षित काउंसलर की मदद लेना चाहिये।
महिला आयोग का हस्‍तक्षेप
महिला आयोग का महिला हिंसा के संबंध में संदेश सरकार को मिलना चाहिये। वह ताकतवर है, यह संदेश नहीं जा रहा है। वह अपने ही निर्णय को लागू नहीं करवा पा रहा है, यह स्थिति बदलना होगी।
महिला आयोग को नीतिगत स्‍तर पर हस्‍तक्षेप करना चाहिये। जैसे महिला नीति कार्यस्‍थल पर महिला यौन शोषण के बारे में उच्‍चतम न्‍यायालय के आदेश का क्रियान्‍वयन कैसे हो रहा है। महिला विकास कार्यक्रम की क्‍या उपादेयता है, उसे कैसेट सार्थक बनाया जा सकता है। ऐसे कौन से निर्णय एवं कार्य हैं, जो महिलाओं पर विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं, इन सब पर आयोग को नजर रखनी चाहिये और समय-समय पर हस्‍तक्षेप करते रहना चाहिये।
घरेलू हिंसा के उदाहरण
(1) शारिरिक हिंसा
  • मारपीट करना
  • थप्‍पड़ मारना
  • ठोकर मारना
  • दांत से काटना
  • लात मारना
  • मुक्‍का मारना
  • धकेलना
  • किसी अन्‍य रीति से शारीरिक पीड़ा या क्षति पहुँचाना
(2) लैंगिक हिंसा
  • बलात लैंगिक मै‍थुन
  • अश्‍लील साहित्‍य या कोई अन्‍य अश्‍लील तस्‍वीरों या को देखने के लिए वि‍वश करना
  • दुर्व्‍यवहार करने, अपमानित करने, अपमानित या नीचा दिखाने की लैंगिक प्रवृत्ति का कोई अन्‍य कार्य अथवा जो प्रतिष्‍ठा का उल्‍लंघन करता हो या कोई अन्‍य अस्‍वीकार्य लैंगिक प्रक़ति का हो।
(3) मौखिक और भावनान्‍तम हिंसा
  • अपमान
  • गालियॉं देना
  • चरित्र और आचरण पर दोषारोपण
  • पुत्र न होने पर अपमानित करना
  • दहेज इत्‍यादि न लाने पर अपमान
  • नौकरी करने से निवारित करना
  • नौकरी छोड़ने के लिये दबाव डालना
  • घटनाओं के सामान्‍य क्रम में किसी व्‍यक्ति से मिलने से रोकरना
  • विवाह नहीं करने की इच्‍छा पर विवाह के लिये विवश करना
  • पसंद के व्‍यक्ति से विवाह करने से रोकना
  • किसी विशेष व्‍यक्ति से विवाह करने के लिए विवश करना
  • आत्‍महत्‍या करने की धमकी देना
  • कोई अन्‍य मौखिक या भावनात्‍मक दुर्व्‍यवहार
(4) आर्थिक हिंसा
  • बच्‍चों के अनुरक्षण के लिये धन उपलब्‍ध न कराना
  • बच्‍चों के लिए खाना, कपड़े और दवाइयॉं उपलब्‍ध न कराना
  • रोजगार चलाने से रोकना अथवा उसमें विघ्‍न डालना
  • रोजगार करने के अनुज्ञात न करना
  • वेतन पारिश्रमिक इत्‍यादि से आय को ले लेना
  • वेतन पारिश्रमिक उपभोग करने का अनुज्ञात न करना
  • घर से निकलने को विवश करना
  • महिला के प्रति हिंसात्‍मक व्‍यवहार का वैधानिक स्‍वरूप और उत्‍पीड़क व्‍यक्ति पर वैधानिक सजा का प्रावधान
उत्‍पीडि़त महिला के साथा हिंसात्‍मक व्‍यवहार (स्‍वरूप) वैधानिक अपराध वैधानिक संभावित धारा उत्‍पीड़क के प्रति सजा का प्रावधान:-
1 मानसिक हिंसा- बेइज्‍जत करना, ताने देना, गाली-गलौच करना, झूठा आरोप लगाना, मूलभूत आवश्‍यकताओं को पूरा न करना एवं मायके से न बुलाना इत्‍यादि  धारा 498, सज़ा 3 साल
हिंसा की धमकी- शारीरिक प्रताड़ना, तलाक एवं मूलभूत आवश्‍यकताओं को पूरा न करने की धमकी देना। पति या उसके रिश्‍तेदारों द्वारा मानसिक या शारीरि कष्‍ट देना। धारा 498, सज़ा 3 साल
2 झूठा आरोप लगाना या बेइज्‍जत करना।  धारा 499, सज़ा 2 साल
3 साधारण शारीरिक हिंसा- चांटा मारना, धक्‍का देना और छीना झपटी करना।   तामाचा मारना, चोट पहुंचाना    धारा 319, सज़ा 3 माह
4 साधारण शारीरिक हिंसा – लकड़ी या हल्‍की वस्‍तु से पीटना, लात मारना, घूंसा मारना, माचिस या सिगरेट से जलाना। आत्‍महत्‍या के लिए दबाव डालना, साधारण या गंभीर हिंसा धारा 306, सज़ा 3 साल
5 अत्‍यंत गंभीर हिंसा– गंभीर रूप से पीटना जिससे हड़डी टूटना या खिसकना जैसी घटनाएं शामिल है। गंभीर रूप से जलाना, लोहे की छड़, धारदार वस्‍तु या भारी वस्‍तु से वार करना। गंभीर हिंसा – लोहे की छड़, तेज धार वस्‍तु का प्रयोग।धारा 232, सज़ा 7 साल
दहेज मृत्‍यु धारा 304, सज़ा आजीवन कारावास
महिला की शालीनता भंग करने की मंशा से हिंसा या जबरदस्‍ती करना धारा 54, सज़ा 2 साल
अपहरण, भगाना या महिला को शादी के लिये विवश करना। धारा 366, सज़ा 10 साल
नाबालिक लड़की को कब्‍जे में रखना धारा 366, सज़ा 10 साल
बलात्‍कार (सरकारी कर्मचारी द्वारा या सामूहिक बलात्‍कार अधिक गंभीर माने जाते हैं) धारा 376 2- सज़ा 10 वर्ष की उम्र कैद
पहली पत्‍नी के जीवित होते हुए दूसरी शादी करना धारा 494, सज़ा 7 साल
व्‍यभिचार         धारा 497, सज़ा 5 साल
महिला की शालीनता को अपमानित करने की मंशा से अपशब्‍द या अश्‍लील हरकतें करना धारा 509, सज़ा 1 साल

घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005

घरेलू हिंसा की परिभाषा :-
इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ घरेलू हिंसा शब्द का व्यापक अर्थ लिया गया है। इसमें प्रत्यर्थी का कोई भी ऐसा कार्य, लोप या आचरण घरेलू हिंसा कहलाएगा, यदि वह व्यथित व्यक्ति (पीडि़त) के स्वास्थ्य की सुरक्षा, जीवन, उसके शारीरिक अंगों या उसके कल्याण को नुकसान पहुंचाता है या क्षतिग्रस्त करता है या ऐसा करने का प्रयास करता है। इसमें व्यथित व्यक्ति का शारीरिक दुरुपयोग, शाब्दिक या भावनात्मक दुरुपयोग और आर्थिक दुरुपयोग शामिल है। (धारा 3-क) राज्य सरकार द्वारा घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत सभी उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग एवं समस्त बाल विकास परियोजना अधिकारियों एवं समस्त प्रचेताओं को कुल 574 अधिकारियों को संरक्षण अधिकारी नियुक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त संरक्षण अधिकारी संविदा के आधार पर स्वीकृत किये गये हैं। राज्य में अभी तक 87 गैर-शासकीय संस्थाओं को सेवाप्रदाता के रूप में पंजीकृत किया गया है तथा 13 संस्थाओं को आश्रयगृह के रूप में अधिसूचित किया गया है।
राज्य में सरकार के अधीन संचालित सभी जिला अस्पतालों, सेटेलाइट अस्पतालों, उपजिला अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को चिकित्सा सुविधा के रूप में अधिसूचित किया गया है। मजिस्ट्रेट द्वारा किसी प्रकरण में परामर्शदाता नियुक्त करने हेतु जिलों में परामर्शदाताओं की सूची उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग (जिला संरक्षण अधिकारी) द्वारा तैयार की जाती है। व्यथित महिलाओं को तुरंत राहत पहुंचाने आदि के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रावधान किया गया है। प्रत्येक जिले में आवश्यकतानुसार राशि आवंटित की गई है। घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम की उपयुक्त क्रियान्वति एवं प्रबोधन की दृष्टि से जिला महिला सहायता समिति को शीर्ष संस्था बनाया गया है।
व्यथित महिला किससे सम्पर्क करे-
संरक्षण अधिकारी से सम्पर्क कर सकती है। (सम्बन्धित उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास, बाल विकास परियोजना अधिकारी एवं प्रचेता) सेवा प्रदाता संस्था से सम्पर्क कर सकती है। पुलिस स्टेशन से सम्पर्क कर सकती है। किसी भी सहयोगी के माध्यम से अथवा स्वयं सीधे न्यायालय में प्रार्थना पत्र दे सकती है।
व्यथित महिला को राहत-
इस अधिनियम के अन्तर्गत व्यथित महिला को मजिस्ट्रेट उसके संतान या संतानों को अस्थाई अभिरक्षा, घरेलू हिंसा के कारण हुई किसी क्षति के लिए प्रतिकार आदेश एवं आर्थिक सहायता के लिए आदेश दे सकते हैं। साथ ही आवश्यकता पडऩे पर ‘साझा घरÓ में निवास के आदेश भी दिए जा सकते हैं। अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत न्यायालय द्वारा पारित संरक्षण आदेश की अनुपालना नहीं करने पर प्रत्यर्थी को एक वर्ष तक का दंड एवं बीस हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों का दंड दिया जा सकता है।

भ्रष्टाचार पर कानून – Corruption Law

अस्सी के दशक में उजागर हुए भ्रष्टाचार के कारण एवं उपचार के लिए एन.एन. बोहरा कमिटी 1993 में भारत सरकार के द्वारा नियुक्त किया गया। एन.एन. बोहरा कमिटी रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि देश के अन्दर अपराधिक गैंग, पुलिस अफसर एवं राजनीतिज्ञ देश के अन्दर भ्रष्टाचार में संलिप्त है।
मौजूदा अपराधिक कानूनी प्रावधान भ्रष्टाचार को रोकने में काफी नहीं है क्योंकि अपराधिक कानूनी प्रावधान के अन्तर्गत व्यक्तिगत अपराध को रोकने का सशक्त प्रावधान है लेकिन अपराधियों को विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले अपराधिक चरित्र के पदाधिकारी, पुलिस राजनीतिज्ञ एवं अपराधियों के मिलीभगत से भ्रष्टाचार के व्यापार को आगे बढ़ाया गया है। इसमें सिंडिकेट माफियागिरोह एवं असामाजिक तत्वों की साठ-गांठ मुख्य भूमिका रहती है। जिनका गठजोड़ सरकारी महकमे से सीधे तौर पर बना रहता है और कुछ राजनीतिज्ञ इन भ्रष्टाचारियों को संरक्षण प्रदान करते हैं।
भ्रष्टाचार का मुद्दा वर्तमान में एक वैश्विक मुद्दा बन गया है। इस सवाल को लेकर संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव कौफी-अनान ने एक कंवेशन आयोजन करके यह स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार का प्लेग पूरे दुनिया में बड़े पैमाने पर सामाजिक मूल्यों को तोड़ रहा है तथा इसके कुप्रभाव से पूरे विश्व का सामाजिक एवं आर्थिक संतुलन खतरे में पड़ गया है जिसके परिणामस्वरूप विश्व में आतंकवाद एवं उग्रवाद ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। आतंकवाद एवं उग्रवाद की समस्या पूरे विश्व की समस्या है जो सभी जाति, धर्म, समुदाय के सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक संरचना को प्रभावित करती है और जो सामाजिक तनाव की स्थिति उत्पन्न किया है।
यह परिस्थिति विश्व के सभी बड़े-छोटे, गरीब-अमीर राष्ट्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दिया है जो विश्व के विकास में विनाशकारी सिध्द हो रहा है। अविकसित एवं अर्ध्दविकसित राष्ट्रों में यह स्थिति बहुत ही विकराल है जहां पर विकास के विशेष कोश को गलत तरीके से मोड़कर भ्रष्टाचार की ओर ले जाया जाता है तथा राष्ट्र का विकास नहीं हो पाता है जो एक विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के उक्त कन्वेंशन के प्रस्तावना जो भारत के द्वारा 31 अक्टूबर 2003 को स्वीकार किया गया है। जिसमें स्पष्ट किया गया कि भारत में भ्रष्टाचार से अस्थिरिता की स्थिति उत्पन्न की जा रही है जो लोकतांत्रिक, सामाजिक एवं राजनैतिक मूल्यों, को ह्रास की ओर अग्रसित कर रहा है। जिसके चलते कानून एवं न्यायायिक प्रणाली के सम्मान के प्रतिकूल कार्य किया जा रहा है।
कन्वेंशन में यह भी स्पष्ट हुआ था कि भ्रष्टाचार के चलते विश्व संकट के दौर से गुजर रही है। भ्रष्टाचार विरोधी, मशीनरी भ्रष्टाचार को रोकने में असफल सिध्द हो रही है। इसलिए कन्वेंशन ने भ्रष्टाचार को एक अन्तरराष्ट्रीय मुद्दा मानते हुए भ्रष्टाचार विरोधी संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के रूप में प्रतिपादित किया गया।
अनुच्छेद 6 (2) भ्रष्टाचार विरोधी संयुक्त राष्ट्र की घोषणा यह स्पष्ट करता है कि सभी राष्ट्र जो इस मसौदे को स्वीकार किये हैं उन्हें अपने देश के अन्दर स्थानीय एवं संवैधानिक कानून के दायरे में एक भ्रष्टाचार विरोधी कानून लागू करें। जिसकी प्रयिा न्यायपालिका के प्रक्रिया में निहित हो तथा भ्रष्टाचार निवारण के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसके अन्तर्गत इस विशेष कार्य दक्ष व्यक्तियों, सर्तकता अधिकारियों एवं न्यायायिक पदाधिकारियों के संयुक्त कार्यक्षेत्र को निर्धारित करते हुए भ्रष्टाचार विरोधी कानून लागू किया जाए तथा भ्रष्टाचार विरोधी कार्यक्रम को सुनियोजित ढंग से अमल में लाने के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं संस्था की व्यवस्था करना आवश्यक है। अनुच्छेद 7(4) एवं 8 (2) संयुक्त राष्ट्र संघ भ्रष्टाचार विरोधी कन्वेंशन के अन्तर्गत सम्पादित करने वाले राष्ट्र को अपने स्थानीय कानून के अनुकूल एवं कानूनी व्यवस्था को मजबूत करते हुए भ्रष्टाचार के विरुध्द सशक्त कानून लागू करने पर बल दिया साथ ही कन्वेंशन में न्यायायिक एवं कानूनी संस्थान में एक मानक स्थापित करने के लिए आचरण कोड लागू करने तथा कानून को प्रभावशाली ढंग से लागू करने पर जोर दिया गया।
अनुच्छेद 12 संयुक्त राष्ट्र संघ भ्रष्टाचार विरोधी कन्वेंशन के अन्तर्गत यह स्पष्ट है कि निजी क्षेत्र के संस्थानों के अन्तर्गत भी भ्रष्टाचार विरोधी कानून प्रभावशाली ढंग से लागू हो तथा निजी क्षेत्र के अन्तर्गत निजी संस्थानों की पहचान को बरकरार रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी कानून लागू किया जाए ताकि समाज के निजी या सरकारी क्षेत्र से भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो सके।
उक्त कन्वेंशन के अनुच्छेद 13 एवं 34 के प्रावधान के अन्तर्गत यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक राष्ट्र अपने देश के अन्तर्गत सिविल सोसाइटी, गैरसरकारी संस्थान एवं समुदाय आधारित संगठन को भ्रष्टाचार के विरुध्द लड़ाई में जोड़ने के लिए बल दिया है तथा आम जनता के द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी कानून एवं नियमांकन निर्धारित किया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र संघ के भ्रष्टाचार विरोधी कन्वेंशन में शिकायतों का अनुसंधान तथा सरकारी कर्मचारियों को भ्रष्टाचार के विरुध्द दण्डित किये जाने के उद्देश्य से भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकार लागू किया जाना चाहिए यदि भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकार के अधिकारी एवं पदाधिकारी को भ्रष्टाचार में लिप्त होने की शिकायत की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 136, 226 एवं 32 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकार के पदाधिकारी के विरुध्द माननीय उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय संज्ञान लेते हुए दण्डित करने का प्रावधान उक्त कन्वेंशन में प्रस्तावित किया गया। इसी संदर्भ को लेकर भारत में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 लागू किया गया लेकिन इसके बावजूद भी भ्रष्टाचार उन्मूलन में कारगर परिणाम नहीं आने के चलते सिविल सोसायटी एवं गैरसरकारी संस्थानों के संयुक्त पहल से भारत में लोकपाल गठन करने के लिए मांग एवं आंदोलन किया जाने लगा। इसी की व्युतपत्ति जनलोकपाल बिल 2011 है।
जन लोकपाल बिल भारत में नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित भ्रष्टाचार निवारण बिल का मसौदा है। यह सशक्त जनलोकपाल के स्थापना का प्रावधान करता है जो चुनाव आयुक्त की तरह स्वतंत्र संस्था होगी। जनलोकपाल के पास भ्रष्ट राजनेताओं एवं नौकरशाहों पर बिना किसी से अनुमति लिये ही अभियोग चलाने की शक्ति होगी। भ्रष्टाचार विरोधी भारत (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) नामक गैरसरकारी सामाजिक संगठन का निर्माण करेंगे।
संतोष हेगड़े, वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रशांत भूषण, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी ने यह बिल भारत के विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनता के साथ व्यापक विचार विमर्श के बाद तैयार किया था। इसे लागू कराने के लिए सुप्रसिध्द सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में अनशन शुरू किया गया था। 16 अगस्त में हुए जनलोकपाल बिल आंदोलन 2011 को मिले व्यापक जनसमर्थन ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली भारत सरकार को संसद में प्रस्तुत सरकारी लोकपाल बिल के बदले एक सशक्त लोकपाल के गठन के लिए सहमत होना पड़ा।
जनलोकपाल विधेयक के अनुसार केन्द्र में लोकपाल और रायों में लोकायुक्त का गठन हो यह संस्था निर्वाचन आयोग और उच्चतम न्यायालय की तरह सरकार से स्वतंत्र रहे। किसी भी मुकद्दमे की जांच 3 महीने के अंदर पूरा करने और सुनवाई अगले 6 महीने के अन्दर आवश्यक रूप से पूरी की जाए। भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को एक साल के लिए अंदर जेल भेजे जाने का प्रस्ताव किया गया। भ्रष्टाचार के कारण से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसकी क्षतिपूर्ति दोषी से किया जाये। अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल के दोषी अधिकारी पर जुर्माना लगाने एवं शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति करने का प्रस्ताव दिया गया।
लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीश, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर संयुक्त रूप से करने तथा राजनीतिज्ञों का कोई हस्तक्षेप नहीं करने पर बल दिया गया। लोकपाललोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए तथा लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त एवं दण्डित करने का प्रस्ताव दिया गया। सीवीसी, गुप्तचर विभाग और सीबीआई के भ्रष्टाचार विरोधी विभाग का लोकपाल में विलय करने का प्रस्ताव दिया गया है। लोकपाल को किसी भी भ्रष्ट जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकद्दमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था देने का प्रस्ताव जनलोकपाल विधेयक में दिया गया है।
सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर खुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरू करने का अधिकार नहीं होगा। सांसदों से संबंधित मामलों में आम लोगों को अपनी शिकायतें रायसभा के सभापति या लोकसभा अध्यक्ष को भेजनी पड़ेंगी। वही प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल खुद किसी भी मामले की जांच शुरू करने का अधिकार रखता है। इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।  सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनों सदनों के नेता, दोनों सदनों के विपक्ष के नेता, कानून और गृह मंत्री होंगे। वहीं प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में न्यायिक क्षेत्र क लोग मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता चयन करेंगे।
सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर खुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरू करने का अधिकार नहीं होगा। सांसदों से संबंधित मामलों में आम लोगों को अपनी शिकायतें रायसभा के सभापति या लोकसभा अध्यक्ष को भेजनी पड़ेगी वहीं प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल खुद किसी मामले की जाँच शुरू करने का अधिकार रखता है। इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति नहीं है। सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्श दे सकता है वह जांच के बाद अधिकार प्राप्त संस्था के पास सिफारिश भेज सकता है जहां तक मंत्रिमंडल के सदस्यों का सवाल है इसी पर प्रधानमंत्री फैसला करेंगे। वहीं जनलोकपाल सशक्त संस्था होगी उसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुध्द कार्रवाई की क्षमता होगी सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस शक्ति नहीं होगी। जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज करा पाएगा, बल्कि उसके पास पुलिस फोर्स भी होगी। अगर कोई शिकायत झूठी पाई जाती है तो सरकारी विधेयक में शिकायतकर्ता को जेल भेजा जा सकता है, लेकिन जन लोकपाल बिल में झूठी शिकायत करने वालों पर जुर्माना लगाने का प्रावधान है।
सरकारी विधेयक में लोकपाल का अधिकार क्षेत्र सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री तक सीमित रहेगा। जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री समेत नेता अधिकारी एवं न्यायाधीश सभी आएंगें। लोकपाल में तीन सदस्य होगें जो सभी सेवानिवृत न्यायाधीश होंगे लेकिन जनलोकपाल में दस सदस्य होंगे जिसका एक अध्यक्ष होगा चार सदस्यों की कानूनी पृष्ठभूमि होना अनिवार्य है। बाकी सदस्यों का चयन अन्य क्षेत्रों से गुणवत्ता के अधार पर किये जाने का प्रस्ताव है। सरकार के द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति, प्रधामंत्री दोनों सदनों के नेता एवं विपक्ष के नेता कानून और गृह मंत्री है। वहीं जनलोकपाल बिल में न्याययिक क्षेत्र के लोग, चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता चयन करेंगे।
लोकपाल की जांच पूरी होने के लिए 6 महीने से लेकर एक साल तक का समय निर्धारित किया गया है। जनलोकपाल बिल के अनुसार एक साल के अन्दर जांच एवं अदालती कार्रवाई पूरी हो जानी चाहिए। सरकारी लोकपाल विधेयक में नौकरशाह और जज के खिलाफ जांच का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन जनलोकपाल के तहत नौकरशाह एवं जजों के खिलाफ भी जांच करने का अधिकार शामिल है।
सरकारी लोकपाल विधेयक में दोषी को छह से सात महीने की सजा हो सकती है और घोटाले के धन को वापिस लेने का कोई प्रावधान नहीं है, वहीं जनलोकपाल बिल में कम से कम पांच साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है। साथ ही घोटाले की भरपाई का भी प्रावधान है। ऐसी स्थिति में जिसमें लोकपाल भ्रष्ट पाया जाए उसमें जनलोकपाल बिल में उसको पद से हटाने का प्रावधान भी है। इसी के साथ केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, सीबीआई की भ्रष्टाचार निवारण शाखा सभी को जनलोकपाल का हिस्सा बनाने का प्रावधान भी है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947

औद्योगिक विवाद के विवाद हैं जो औद्योगिक संबंधों में कोई असहमति हो जाने के कारण उत्‍पन्‍न होते हैं। औद्योगिक संबंध शब्‍द से नियोजक और कर्मचारियों के बीच; कर्मचारियों के बीच तथा नियोजकों के बीच परस्‍पर संवादों के कई पहलू जुड़े हुए हैं।
ऐसे संबंधों में जब भी हितों को लेकर कोई विरोध होता है तो इससे जुड़े किसी एक पक्ष में असंतोष पैदा हो जाता है और इस प्रकार औद्योगिक विवाद अथवा संघर्ष हो जाता है, यह विवाद कई रूप ले लेता है जैसे कि विरोध, हड़ताल, धरना, तालाबंदी, छंटनी, कर्मचारियों की बर्खास्‍तगी, आदि।
औद्योगिक विवाद के मुख्‍य कारण
औद्योगिक विवाद के कुछ मुख्‍य कारण इस प्रकार है:-
  • अधिक वेतन और भत्तों की मांग करना
  • बोनस का भुगतान करने और उसकी दर निर्धारित करने की मांग करना।
  • सामाजिक सुरक्षा के लाभों को बढ़ाने की मांग करना।
  • कार्य की अच्‍छी और सुरक्षित दशाओं जिसमें कार्य दिवस के घंटे, मध्‍यावकाश और कार्य के बीच-बीच में अवकाश और शारीरिक श्रम के लिए परिवेश की मांग करना।
  • श्रम कल्‍याण और अन्‍य लाभों में वृद्धि करने की मांग करना। उदाहरणार्थ, अच्‍छी कैंटीन, विश्राम, मनोरंजन और आवास की सुविधा, दूरवर्ती स्‍थानों की जाने और जाने की यात्रा की व्‍यवस्‍था, आदि।
  • इसके अलावा, खराब कार्मिक प्रबंध; परस्‍पर विरोधी विधायी उपाय एवं सरकारी नीतियों; और मनोवैज्ञानिक घटकों जैसे कि कर्मचारी द्वारा उसकी आत्‍माभिव्‍यक्ति, व्‍यक्तिगत उपलब्धि और उन्‍नति की मूल आकांक्षा की तुष्टि करने के लिए अवसर प्रदान करने से इंकार करना, आदि के कारण भी श्रमिकों संबंधी समस्‍याएं हो सकती हैं।

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947

भारत में, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 सभी औद्योगिक विवादों की जांच पड़ताल एवं निपटान करने के लिए एक प्रमुख विधान है। इस अधिनियम में उन संभावनाओं की हड़ताल अथवा तालाबंदी की जा सकती है, उन्‍हें अवैध अथवा गैर-कानूनी घोषित किया जा सकता है, कर्मचारी की जबरदस्‍ती कामबंदी, छंटनी, उसे सेवामुक्‍त करना अथवा गबर्खास्‍त करने की दशाओं, उन परिस्थितियों जिनमें औद्योगिक इकाई को बंद किया जा सकता है और औद्योगिक कर्मचारियों तथा नियोजकों से जुड़े अन्‍य कई मामलों का उल्‍लेख किया गया है।
यह अधिनियम श्रम मंत्रालय द्वारा उसके औद्योगिक संबंध प्रभाग के माध्‍यम से प्रशासित किया जाता है। यह प्रभाग विवादों का निपटान करने के लिए संस्‍थागत ढांचों में सुधार करने और औद्योगिक संबंधों से जुड़े श्रमिक कानूनों में संशोधन करने से संबंधित है। यह सुनिश्चित करने के प्रयास से कि देश को एक स्‍थायी, प्रतिष्ठित और कुशल कार्यबल प्राप्‍त हो, जिसका शोषण न किया जा सके और उत्‍पादन के उच्‍च स्‍तर स्‍थापित करने में सक्षम हो, यह केन्‍द्रीय औद्योगिक संबंध मशीनरी (सीआईआरएम) के साथ अच्‍छे तालमेल से कार्य करता है। सीआईआरएम जो कि श्रम मंत्रालय का एक संगठन कार्यालय है को मुख्‍य श्रम आयुक्‍त (केन्‍द्रीय) [सीएलसी (सी)] संगठन के नाम से भी जाना जाता है। सीआईआरएम के प्रमुख मुख्‍य श्रम आयुक्‍त (केन्‍द्रीय) हैं। इसे औद्योगिक संबंधों को रखने, श्रम संबंधी कानूनों को लागू करने और केन्‍द्रीय क्षेत्र में व्‍यापार संघ की सदस्‍यता के सत्‍यापन का कार्य सौंपा गया है। यह निम्‍नि‍लिखित के माध्‍यम से सदभावपूर्ण औद्योगिक संबंधों को सुनिश्चित करता है :-
  • केन्‍द्रीय क्षेत्र में औद्योगिक संबंधों की निगरानी;
  • विवादों का निपटान करने के लिए औद्योगिक विवादों में हस्‍तक्षेप, मध्‍यस्‍थता और उनका समाधान करना;
  • हड़ताल और तालाबंदी को रोकने के लिए हड़ताल और तालाबंदी की संभावना की स्थिति में हस्‍तक्षेप;
  • व्‍यवस्‍थाओं और पंचाटों का कार्यान्‍वयन।

अधिनियम के मुख्‍य उद्देश्‍य

अधिनियम के अ‍नुसार, ‘औद्योगिक विवाद’ शब्‍द का अर्थ है नियोजकों और नियोजकों के बीच, अथवा नियोजकों और कर्मचारियों के बीच, अथवा कर्मचारियों और कर्मचारियों के बीच किसी तरह का विवाद अथवा मतभेद जिसका संबंध नियोजन अथवा नियोजन भिन्‍न मामले अथवा नियोजन की शर्तों अथवा किसी व्‍यक्ति के श्रम की दशाओं से है। अधिनियम के मुख्‍य उद्देश्‍य इस प्रकार हैं :-
  • औद्योगिक वि‍वादों का न्‍यायसंगत, उचित और शांतिपूर्ण ढंग से निपटारा करने के लिए एक उपयुक्‍त मशीनरी प्रदान करना।
  • नियोजक और कर्मचारियों के बीच मित्रता एवं अच्‍छे संबंध स्‍थापित करने और उन्‍हें कायम रखने के उपायों को बढ़ावा देना।
  • गैर-कानूनी हड़तालों और तालाबंदी को रोकना।
  • कर्मचारियों को जबरदस्‍ती कामबंदी, छंटनी, गलत तरीके से बर्खास्‍तगी और उत्‍पीड़न से राहत प्रदान करना।
  • सामूहिक सौदाकारी को बढ़ावा देना।
  • कर्मचारियों की दशा सुधारना।
  • अनुचित श्रम प्रणालियों को रोकना

अधिनियम की कार्यप्रणाली

इस अधिनियम के तहत औद्योगिक विवादों के समाधान और निर्णय के लिए एक सांविधिक तंत्र का गठन किया गया है। इसमें निम्‍नलिखित शामिल हैं :-
अधिनियम में उपयुक्‍त सरकार द्वारा ‘समझौता अधिकारियों’ की नियुक्ति का प्रावधान, जिन्‍हें औद्योगिक विवादों के निपटारे में मध्‍यस्‍थता करने और उसका समर्थन करने का कार्य सौंपा गया है। उन्‍हें किसी विशेष क्षेत्र अथवा विशेष क्षेत्र में विशेष उद्योगों अथवा एक अथवा एक से अधिक विशेष उद्योगों के लिए स्‍थायी तौर पर अथवा सीमित अवधि के लिए नियुक्‍त किया जाएगा। कर्मचारियों और नियोजकों को मिलाना तथा उनके मतभेदों का निवारण करने में उनकी मदद करना इन अधिकारियों का कर्त्तव्‍य है। यदि विवाद का निपटारा हो जाता है तो वह इस आशय की सूचना उपयुक्‍त सरकार को देगा।
उपयुक्‍त सरकार अवसर आने पर एक समझौता बोर्ड का गठन करेगी जिसमें एक अध्‍यक्ष और दो या चार जैसा कि उपयुक्‍त सरकार उचित समझेगी, अन्‍य सदस्‍य शामिल होंगे। अध्‍यक्ष एक स्‍वतंत्र व्‍यक्ति होगा और अन्‍य सदस्‍य विवाद में पक्षों का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए एक समान संख्‍या में नियुक्‍त किए गए व्‍यक्ति होंगे। जहां विवाद बोर्ड को भेजा गया हो तो बोर्ड बिना विलम्‍ब किए, विवाद की छानबीन करेगा और ऐसी हर कार्रवाई करेगा जो वह पक्षकारों को विवाद का न्‍यायसंगत और शांतिपूर्ण निपटारा करने के लिए प्रेरित करने के प्रयोजन से उचित समझेगा।
उपयुक्‍त सरकार अवसर आने पर ऐसी किसी मामले जो औद्योगिक विवाद से संबंधित अथवा संगत प्रतीत हो, की जांच पड़ताल करने के लिए ‘जांच न्‍यायालय’ का भी गठन करेगी। तत्‍पश्‍चात यह सामान्‍यतया शुरू होने के छह माह की अवधि के अंदर इसकी सूचना सरकार को देगा इस न्‍यायालय में एक स्‍वतंत्र व्‍यक्ति अथवा उतने स्‍वतंत्र व्‍यक्ति होंगे जितने उपयुक्‍त सरकार उचित समझेगी और जहां इसमें दो अथवा दो से अधिक सदस्‍य निहित होंगे उनमें से एक की नियुक्ति अध्‍यक्ष के रूप में की जाएगी।
उपयुक्‍त सरकार एक अथवा एक से अधिक ‘श्रम न्‍यायालयों’ का गठन करेगी जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्‍ट किसी मामले से संबंधित औद्योगिक विवादों जैसे कि स्‍थायी आदेशों, कर्मचारियों की सेवा मुक्‍त अथवा बर्खास्‍त करने, गैर कानूनी रूप से अथवा अन्‍यथा की गई हड़ताल अथवा तालाबंदी, प्राप्‍त हो रहे किसी लाभ को वापस लेने, आदि से संबंधित मुद्दों पर निर्णय लेंगे और उन्‍हें इस अधिनियम के तहत सौंपे गए किन्‍हीं अन्‍य कार्यों का निर्वहन करेंगे। श्रम न्‍यायालय में केवल एक व्‍यक्ति शामिल होगा जिसकी नियुक्ति उपयुक्‍त सरकार द्वारा की जाएगी।
उपयुक्त सरकार एक अथवा एक से अधिक ‘औद्योगिक अधिकरणों’ का गठन करेगी जो किसी भी मामले के संबंध में चाहे वह दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्‍ट हो अथवा तीसरी अनुसूची में, हुए औद्योगिक वि‍वादों पर निर्णय लेंगे और इस अधिनियम के तहत उन्‍हें सौंपे गए किन्‍हीं अन्‍य कार्यों का निर्वहन करेंगे। इस अधिकरण में केवल एक ही व्‍यक्ति शामिल होगा जिसकी नियुक्ति उपयुक्‍त सरकार द्वारा की जाएगी। तीसरी अनुसूची में वेतन, बोनस, भत्ते और कुछ अन्‍य लाभ, कार्य की दशाएं, अनुशासन, यौक्तिकीकरण, छंटनी और प्रतिष्‍ठान की समाप्ति जैसे मामले शामिल हैं।
केन्‍द्र सरकार सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा एक अथवा एक से अधिक राष्‍ट्रीय औद्योगिक अधिकरणों का गठन करेगी जो उन औद्योगिक विवादों पर निर्णय लेंगे जो केन्‍द्र सरकार की राय में राष्‍ट्रीय महत्‍व के प्रश्‍नों से संबंधित हों अथवा इस किस्‍म के हों कि उनसे एक से अधिक राज्‍यों में स्थित औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों का हित जुड़ा हो अथवा वे ऐसे विवादों से प्रभावित हो सकते हों। ऐसे अधिकरण में केवल एक व्‍यक्ति शामिल होगा जिसकी नियुक्ति केन्‍द्र सरकार द्वारा की जाएगी।
अधिनियम में नियोक्‍ता के लिए यह अनिवार्य है कि वह किसी ऐसे औद्योगिक प्रतिष्‍ठान में जहां पिछले बारह महीनों में पचास अथवा इससे अधिक कर्मचारियों को नियुक्‍त किया गया है, एक ‘शिकायत निपटान प्राधिकरण (जीएसए)’ की स्‍थापना करें। उस प्रतिष्‍ठान में नियुक्‍त हर कर्मचारी के औद्योगिक विवादों को निपटाना उस प्राधिकरण की जिम्‍मेदारी होगी।

विवादों की जांच और उनका निपटारा

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत केन्‍द्रीय सरकार ही केन्‍द्रीय सरकार के विभागीय उपक्रमों, प्रमुख पत्तनों, खानों, तेल क्षेत्रों, छावनी (केंटोनमेंट) बोर्डों, बैकिंग और बीमा कम्‍पनियों, भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी), भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लि., तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लि., इंडियन एयरलांइस, एयर इंडिया, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और सभी हवाई यात्रा सेवाओं से संबंधित औद्योगिक विवादों की जांच करने और उनका निपटारा करने के‍ लिए एक उपयुक्‍त सरकार है। जबकि अन्‍य औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों के संबंध में राज्‍य सरकार ही उपयुक्‍त सरकार है।
तदनुसार, केन्‍द्रीय सरकार औद्योगिक अधिकरणों (सीजीआईटी) एवं श्रम न्‍यायालयों की देश के भिन्‍न-भिन्‍न भागों में स्‍थापना की गई है। इस समय 17 सीजीआईटी हैं जहां औद्योगिक विवादों को निर्णय के लिए प्रस्‍तुत किया जा सकता है। ये सीजीआईटी एवं श्रम न्‍यायालय नई दिल्‍ली, मुम्‍बई (2 सीजीआईटी), बंगलौर, कोलकाता, आसनसोल, धनबाद (2 सीजीआईटी), जबलपुर, चण्‍डीगढ़, कानपुर, जयपुर, लखनऊ, नागपुर, हैदराबाद, चेन्‍नै और भुवनेश्‍वर में हैं। इन केन्‍द्रीय सरकार औद्योगिक अधिकरणों में से 2 केन्‍द्रीय सरकार औद्योगिक अधिकरणों नामत: मुम्‍बई और कोलकाता, को राष्‍ट्रीय औद्योगिक अधिकरण घोषित किया गया है।
इसके अलावा, मुख्‍य श्रम आयुक्‍त (केन्‍द्रीय) संगठन औद्योगिक विवादों के लिए केन्‍द्र सरकार में एक मुख्‍य समझौता एजेंसी के रूप में कार्य करता है क्षेत्रीय आयुक्‍त (केन्‍द्रीय) और सहायक श्रम आयुक्‍त (केन्‍द्रीय) भी हैं जो देश के भिन्‍न-भिन्‍न भागों में मुख्‍य श्रम आयुक्‍त (केन्‍द्रीय) की ओर से समझौता अधिकारियों के तौर पर कार्य करते हैं।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955

हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् 1955 में पारित एक कानून है। इसी कालावधि में तीन अन्य महत्वपूर्ण कानून पारित हुए : हिन्दू उत्तराधिका अधिनियम (1956), हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम (1956), और हिन्दू एडॉप्शन और भरणपोषण अधिनियम (1956). ये सभी नियम हिन्दुओं के वैधिक परम्पराओं को आधुनिक बनाने के ध्येय से लागू किए गये थे।

परिचय

स्मृतिकाल से ही हिंदुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसको इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है। किंतु विवाह, जो पहले एक पवित्र एवं अटूट बंधन था, अधिनियम के अंतर्गत, ऐसा नहीं रह गया है।
कुछ विधिविचारकों की दृष्टि में यह विचारधारा अब शिथिल पड़ गई है। अब यह जन्म जन्मांतर का संबंध अथवा बंधन नहीं वरन् विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर, (अधिनियम के अंतर्गत) वैवाहिक संबंध विघटित किया जा सकता है।
अधिनियम की धारा 10 के अनुसार न्यायिक पृथक्करण निम्न आधारों पर न्यायालय से प्राप्त हो सकता है :
त्याग 2 वर्ष, निर्दयता (शारीरिक एवं मानसिक), कुष्ट रोग (1 वर्ष), रतिजरोग (3 वर्ष), विकृतिमन (2 वर्ष) तथा परपुरुष अथवा पर-स्त्री-गमन (एक बार में भी) अधिनियम की धारा 13 के अनुसार – संसर्ग, धर्मपरिवर्तन, पागलपन (3 वर्ष), कुष्ट रोग (3 वर्ष), रतिज रोग (3 वर्ष), संन्यास, मृत्यु निष्कर्ष (7 वर्ष), पर नैयायिक पृथक्करण की डिक्री पास होने के दो वर्ष बाद तथा दांपत्याधिकार प्रदान करनेवाली डिक्री पास होने के दो साल बाद ‘संबंधविच्छेद’ प्राप्त हो सकता है।
स्त्रियों को निम्न आधारों पर भी संबंधविच्छेद प्राप्त हो सकता है; यथा-द्विविवाह, बलात्कार, पुंमैथुन तथा पशुमैथुन। धारा 11 एवं 12 के अंतर्गत न्यायालय ‘विवाहशून्यता’ की घोषणा कर सकता है। विवाह प्रवृत्तिहीन घोषित किया जा सकता है, यदि दूसरा विवाह सपिंड और निषिद्ध गोत्र में किया गया हो (धारा 11)।
नपुंसकता, पागलपन, मानसिक दुर्बलता, छल एवं कपट से अनुमति प्राप्त करने पर या पत्नी के अन्य पुरुष से (जो उसका पति नहीं है) गर्भवती होने पर विवाह विवर्ज्य घोषित हो सकता है। (धारा 12)।
अधिनियम द्वारा अब हिंदू विवाह प्रणाली में निम्नांकित परिवर्तन किए गए हैं :
(1) अब हर हिंदू स्त्रीपुरुष दूसरे हिंदू स्त्रीपुरुष से विवाह कर सकता है, चाहे वह किसी जाति का हो।
(2) एकविवाह तय किया गया है। द्विविवाह अमान्य एवं दंडनीय भी है।
(3) न्यायिक पृथक्करण, विवाह-संबंध-विच्छेद तथा विवाहशून्यता की डिक्री की घोषणा की व्यवस्था की गई है।
(4) प्रवृत्तिहीन तथा विवर्ज्य विवाह के बाद और डिक्री पास होने के बीच उत्पन्न संतान को वैध घोषित कर दिया गया है। परंतु इसके लिए डिक्री का पास होना आवश्यक है।
(5) न्यायालयों पर यह वैधानिक कर्तव्य नियत किया गया है कि हर वैवाहिक झगड़े में समाधान कराने का प्रथम प्रयास करें।
(6) बाद के बीच या संबंधविच्छेद पर निर्वाहव्यय एवं निर्वाह भत्ता की व्यवस्था की गई है। तथा
(7) न्यायालयों को इस बात का अधिकार दे दिया गया है कि अवयस्क बच्चों की देख रेख एवं भरण पोषण की व्यवस्था करे।
विधिवेत्ताओं का यह विचार है कि हिंदू विवाह के सिद्धांत एवं प्रथा में परिवर्तन करने की जो आवश्यकता उपस्थित हुई थी उसका कारण संभवत: यह है कि हिंदू समाज अब पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति से अधिक प्रभावित हुआ है।

विवाह संबंधी अपराध और कानून

विवाह संबंधी अपराध की धारा 493 से 498 तक—
*     धारा-493: स्त्री को इस विश्वास में रखकर सहवास कि वह पुरुष उससे विधिपूर्वक विवाहित है.
*     धारा-494: पति-पत्नी में से किसी एक के द्वारा दूसरे के जीवित रहने के बावजूद दूसरा विवाह करना.
*     धारा-495: एक पक्ष द्वारा अपने पूर्ववर्ती विवाह को छुपाकर दोबारा से विवाह करना.
*     धारा- 496: लड़का या लड़की द्वारा छलपूर्ण आशय से विपरीत पक्ष को यह विश्वास दिलाना कि उनका विवाह विधिपूर्वक मान्य नहीं है।
*     धारा-497: जारकर्म.
*     धारा- 498: आपराधिक आशस से किसी पुरुष द्वारा विवाहित स्त्री को फुसलाना .
*     धारा-498 क: किसी विवाहित स्त्री पर पति या पति के नातेदार द्वारा क्रूरतापूर्ण व्यवहार.
वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति – कानूनन वैवाहित स्थिति में स्त्री की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा गया है. वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति देखें तो अक्सर वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष पर  दहेज प्रताडऩा, शारीरिक शोषण और पुरुष के पर स्त्री से संबंध जैसे मामले दर्ज कराए जाते हैं, वहीं वर पक्ष द्वारा स्त्री का किसी गैर मर्द से अवैध संबंध, मानसिक प्रताडऩा जैसे मामला दर्ज कराने के मामले देखे गए हैं.वैसे कई बार अदालत में यह भी साबित हुआ है कि वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को तंग करने के लिए अक्सर दहेज के मामले दर्ज कराए जाते हैं। तिहाड़ के महिला जेल में छोटे-से बच्चे से लेकर 90 वर्ष की वृद्धा तक दहेज प्रताडऩा के आरोप में बंद हैं.
दहेज है स्त्री धन- दहेज का अभिप्राय विवाह के समय वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी गई चल-अचल संपत्ति से है। दहेज को स्त्री धन कहा गया है। विवाह के समय सगे-संबंधियों, नातेदारों आदि द्वारा दिया जाने वाला धन, संपत्ति व उपहार भी दहेज के अंतर्गत आता है. यदि विवाह के बाद पति या पति के परिवार वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर दूसरे पक्ष को किसी किस्म का कष्ट, संताप या प्रताडऩा दे तो स्त्री को यह अधिकार है कि वह उक्त सारी संपत्ति को पति पक्ष से वापस ले ले.
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-27 स्त्री को इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करती है। वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फाजिल अली ने अपने एक फैसले में निर्णय दिया था कि स्त्री धन एक स्त्री की अनन्य संपत्ति है. यह संपत्ति पति पक्ष पर पत्नी की धरोहर है और उस पर उसका पूरा अधिकार है। इसका उगंघन दफा-406 के तहत अमानत में ख्यानत का अपराध है, जिसके लिए जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान है। इस निर्णय की वजह से धारा-27 की समुचित व्याख्या हो गई है.
कानूनन स्त्री की सुरक्षा– क्रिमिनल अमेंडमेंट एक्ट की धारा 498 क के अनुसार, एक विवाहित स्त्री पर उसके पति या उसके रिश्तेदार द्वारा किया गया अत्याचार या क्रूरता का व्यवहार एक दंडनीय अपराध है। विधि में यह प्रावधान भी है कि विवाह के सात वर्ष के भीतर यदि पत्नी आत्महत्या कर लेती है या उसकी मौत किसी संदिग्ध परिस्थिति में हो जाती है तो काननू के दृष्टिकोण से यह धारणा बलवती होती है कि उसने यह कदम किसी किस्म की क्रूरता के वशीभूत होकर उठाया है.
पत्नी द्वारा किया जाने वाला अत्याचार— अदालत में स्त्री को मिली कानूनी सुरक्षा का माखौल उड़ते भी देखा गया है. अपने पूर्व के प्रेम संबंध, जबरदस्ती विवाह, आपस में सामांजस्य नहीं बैठने या किसी अन्य कारणों से स्त्री इन सात वर्षों में आत्महत्या की धमकी देते हुए पति का मानसिक शोषण करने की दोषी भी पाई गई हैं. जबरदस्ती दहेज प्रताडऩा में पूरे परिवार को फंसाने का मामला आए दिन सामने आता रहता है.
निष्कर्ष- विवाह वास्तव में एक जुआ की तरह है, यदि दांव सही पड़ गया तो जीवन स्वर्ग, अन्यथा नरक के सभी रास्ते यहीं खुल जाते हैं. अच्छा यह हो कि विवाह के लिए जीवनसाथी का चुनाव लड़का-लड़की खुद करे यानी प्रेम विवाह करे और विवाह होते ही कम से कम सात साल तक दोनो अपने-अपने परिवार से अलग आशियाना बसाए. देखा गया है कि पारिवारिक हस्तक्षेप के कारण ही एक लड़का-लड़की का जीवन नरक बन जाता है पारंपरिक अरेंज मैरिज में भी मां-बाप बच्चों की शादी कर देने के बाद उन्हें स्वतंत्र रूप से जिंदगी जीने दें तो दोनों का जीवन सामांजस्य की पटरी पर आसानी से दौड़ पाएगा.

वैयक्तिक कानून

देश में विभिन्‍न धर्मों और संप्रदायों के लोग रहते हैं। उनके पारिवारिक मामलों जैसे विवाह, तलाक, उत्‍तराधिकार आदि के लिए अलग-अलग तरह के वैयक्तिक कानून हैं।
विवाह
अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए विवाह और/अथवा तलाक विषयक कानून भिन्‍न-भिन्‍न अधिनियमों में उल्लिखित हैं। ये हैं-
  • धर्मांतरण विवाह विच्‍छेद अधिनियम, 1866
  • भारतीय तलाक अधिनियम, 1869
  • भारतीय ईसाई विवाह कानून, 1872
  • काजी अधिनियम, 1880
  • आनंद विवाह अधिनियम, 1909
  • भारतीय उत्‍तराधिकार अधिनियम, 1925
  • बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929
  • पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936
  • मुस्लिम विवाह भंग अधिनियम, 1939
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954
  • विदेशी विवाह अधिनियम, 1969 और
  • मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 जम्‍मू-कश्‍मीर को छोड़कर शेष भारत में लागू है, लेकिन यह देश के उन नागरिकों पर लागू होता है जो जम्‍मू-कश्‍मीर में रह रहे हैं। जिन व्‍यक्तियों पर यह अधिनियम लागू होता है, वे इस अधिनियम के तहत विनिर्दिष्‍ट तौर पर विवाह का पंजीकरण करवा सकते हैं, भले ही वे अलग-अलग धर्मों के मानने वाले क्‍यों न हों। इस अधिनियम की अपेक्षाओं के अनुरूप है तो ऐसे विवाह को विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत किया जा सकता है।
हाल ही में अधिनियम की धारा 4 (बी) (तीन) में संशोधन कर ‘अथवा मिरगी’ शब्‍द हटा दिया गया है। इस कानून की धारा 36 और धारा 38 में भी संशोधन कर यह व्‍यवस्‍था की गई है कि नाबालिग बच्‍चे के पालन-पोषण और शिक्षा के मुकदमे को नोटिस मिलने की तिथि से 60 दिनों के अंदर निपटा लिया जाएगा।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में हिंदुओं के विवाह से संबंधित पारंपरिक कानूनों को संहिताबद्ध करने का प्रयास किया गया है। यह अधिनियम जम्‍मू एवं कश्‍मीर को छोड़कर संपूर्ण भारत में लागू है।
यह अधिनियम उन हिंदुओं पर लागू होता है जो ऐसे राज्‍यों में रहते हों जहां यह अधिनियम लागू नहीं है। इसके अतिरिक्‍त यह सभी प्रकार के हिंदुओं और बौद्ध, सिख, जैन पर भी लागू होता है। इनमें वे सभी शामिल हैं जो अपने आपको मुसलिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं मानते, किंतु यह अधिनियम तब तक किसी भी अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होता, जब तक सरकार अपने गजट में उन्‍हें अधिसूचित न करे या अन्‍य निर्देश न दे।
तलाक संबंधी व्‍यवस्‍थाएं हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 में और विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27 में दी गई है। इन अधिनियमों के अधीन पति या पत्‍नी द्वारा जिन सामान्‍य आधारों पर विवाह के विच्‍छेद की मांग की जा रही है, वे इन प्रमुख शीर्षो के अंतर्गत हैं- व्‍याभिचार, क्रूरता, विकृत मन, रति रोग, कुष्‍ठ रोग, परस्‍पर सहमति और जीवित रहने के बारे में सात वर्षों तक नहीं सुना सकता।
जहां तक ईसाई धर्म का संबंध है, उनके विवाह और तलाक संबंधी व्‍यवस्‍थाएं क्रमश: भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 और भारतीय विवाह विच्‍छेद अधिनियम, 1869 की धारा 10 में हैं। इस धारा के अनुसार, कोई पति इस आधार पर तलाक की मांग कर सकता है कि उसकी पत्‍नी व्‍यभिचारिणी है, जबकि पत्‍नी इस आधार पर तलाक की मांग कर सकती है कि उसके पति ने धर्म परिवर्तन कर लिया है या उसने दूसरी स्‍त्री से शादी कर ली है या वह
पारिवारिक व्‍यभिचार,
व्‍यभिचार सहित द्विविवाह,
किसी अन्‍य व्‍यभिचारी स्‍त्री से विवाह,
बलात्‍कार, गुदा मैथुन या पशु‍गमन,
ऐसी क्रूरता से युक्‍त व्‍यभिचार, जो व्‍यभिचार के बिना भी पत्‍नी को तलाक मांगने की अधिकारिणी बना देता है- ए मेंसा एटोरो (यह रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा बनाई गई विवाह- विच्‍छेद की एक एसी पद्धति है जो व्‍यभिचार, दोषपूर्ण आचरण, क्रूरता, पाखंड, धर्मविमुखता आदि के आधार पर न्‍यायिक पृथक्‍करण के समकक्ष है), और
दो वर्ष या इससे अधिक समय से युक्तिसंगत कारण के बिना परित्‍याग स‍हित व्‍यभिचार का दोषी है।
तलाक के मामले में महिलाओं के प्रति पक्षपातपूर्ण प्रावधानों को हटाने के लिए भारतीय तलाक (संशोधन) अधिनियम, 2001 के जरिए भारतीय तलाक अधिनियम, 1896 में व्‍यापक संशोधन किए गए। इसके अतिरिक्‍त इस अधिनियम की धारा 36 और 41 में विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 2001 के जरिए संशोधन किया गया, ताकि गुजारा खर्चा अथवा नाबालिग बच्‍चों के भरण-पोषण और शिक्षा व्‍यय के वहन के लिए दी जाने वाली याचिका का निपटारा प्रतिवादी को नोटिस दिए जाने के 60 दिनों के भीतर किया जा सके।
जहां तक मुसलमानों का प्रश्‍न है, देश में विवाह से संबंधित प्रचलित मुस्ल्मि कानून उन पर लागू होता है। जहां तक उनकें तलाक का संबंध है, मुस्ल्मि पत्‍नी को तलाक के बहुत सीमित अधिकार प्राप्‍त हैं। अलिखित और पारंपरिक कानूनों में निम्‍नलिखित रूपों में तलाक के बहुत सीमित अधिकार प्राप्‍त हैं। अलिखित और पांरपरिक कानूनों में निम्‍नलिखित रूपों में तलाक की मांग करने की इजाजत देकर उसकी स्‍थिति को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है-
तलाके- तौफिद: यह तलाक का एक रूप है जिसके अनुसार पति अपने तलाक का अधिकार अपनी शादी के इकरारनामे में पत्‍नी को सौंप देता है। इस स्थिति में अन्य बातों के अतिरिक्‍त यह शर्त भी हो सकती है कि पति दूसरी शादी कर लेने पर उसकी पहली पत्‍नी को तलाक ले लेने का अधिकार होगा।
खुला: इसके अनूसार पति-पत्‍नी आपस में विवाह के लिए किए गए समझौते को समाप्‍त कर तलाक ले लेते हैं। इस पद्धति में पत्‍नी तलाक लेने के लिए आम तौर पर पति से अपना मेहर नहीं मांगती है। तलाक लेने की शर्ते आपस में पत्‍नी तलाक लेने के लिए आम तौर पर पति से अपना मेहर नहीं मांगती है। तलाक लेने की शर्ते आपस में तय की जाती है
मुबारत: यह आपसी‍ रजामंदी का तलाक होता है।
साथ ही, मुस्लिम विवाह विच्‍छेद अधिनियम, 1939 द्वारा मुस्लिम पत्‍नी को निम्‍नलिखित आधारों पर तलाक पाने का अधिकार दिया गया है-
  • चार वर्षों से पति के संबंध में कोई जानकारी न हो,
  • पति दो वर्ष से उसका भरण-पोषण नहीं कर रहा हो,
  • पति सात वर्ष या उससे अधिक का कारावास दे दिया गया हो,
  • किसी समुचित कारण के बिना पति तीन वर्ष से अपने वैवाहिक दायित्‍वों का निर्वाह नहीं कर रहा हो,
  • पति नपुंसक हो,
  • पति दो वर्ष से पागल हो,
  • पति कुष्‍ठ रोग या उग्र रति रोग से पीडि़त हो,
  • उस(पत्‍नी) की शादी 15 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले हो चुकी हो और उसने पति के साथ सहवास न किया हो, और
  • पति का व्‍यवहार क्रूर रहा हो।
  • पारसी विवाह और तलाक अधिनियम,
1936 पारसियों के वैवाहिक संबंधों के बारे में है। इस अधिनियम में ‘पारसी’ शब्‍द को ‘जरथ्रुष्‍टपंथी पारसी’ के रूप में पारिभाषित किया गया है। जरथ्रुष्‍टपंथी वह होता है जो जरथ्रुष्‍ट धर्म को मानता है। यह नस्‍ल द्योतक है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रत्‍येक विवाह और तलाक को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पंजीकृत कराना आवश्‍यक है लेकिन इस प्रक्रिया का पालन न करने से विवाह गैर कानूनी नहीं होता।
अधिनियम में केवल एकल विवाह की व्‍यवस्‍था है। पा‍रसी विवाह और तलाक (संशोधन) अधिनियम, 1988 के तहत पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के कुछ प्रावधानों का विस्‍तार कर उन्‍हें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुरूप बना दिया गया है। इस अधिनियम की धारा 39 और धारा 49 में विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 2001 द्वारा संशोधन कर यह व्‍यवस्‍था की गई है कि मुकदमे के दौरान निर्वाह और नाबालिग बच्‍चों की शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता संबंधी याचिका पर प्रतिवाद, पति अथवा पत्‍नी, को नोटिस‍ मिलने की तिथि से 60 दिनों के अंदर फैसला घोषित कर दिया जाएगा।
यहूदियों के वैवाहिक कानूनों के बारे में देश में कोई संहिताबद्ध विधि नहीं है। आज भी वे अपने धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। वे लोग विवाह को सिविल संविदा न मानकर, दो व्‍यक्तियों के बीच स्‍थापित ऐसा संबंध मानते हैं जिनमें अत्‍यंत पवित्र कर्तव्‍यों का पालन करना होता है। इसमें भी पर पुरूषगमन या पर स्‍त्री गमन अथवा क्रूर व्‍यवहार किए जाने पर न्‍यायालय के माध्‍यम से तलाक दिया या लिया जा सकता है। उनमें भी एक विवाह का ही प्रचलन है।

बाल विवाह- Bal Vivah

वर्ष 1929 में बाल विवाह निरोधक अधिनियम में 1978 में संशोधन कर, विवाह के लिए पुरूष की न्‍यूनतमनई दिल्ली। हिंदू महिला को अब तलाक के बाद भी पति की संपत्ति में हक मिल सकेगा। हालांकि यह कितना होगा, इसका फैसला अदालत करेगी। नया कानून पत्नी को यह छूट भी देगा कि वह दुष्कर दांपत्य जीवन का हवाला देते हुए तलाक मांग सकती है।
केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में संशोधन के मकसद से तैयार विवाह कानून [संशोधन] विधेयक, 2010 को संसद में पेश करने की मंजूरी दे दी। इसके तहत दांपत्य जीवन में महिलाओं को कई नए अधिकार मिलेंगे। इस विधेयक के मुताबिक महिलाओं को तलाक के बाद भी पति की संपत्ति में पूरा अधिकार होगा। हालांकि उसे इसमें से कितनी संपत्ति दी जाएगी, इसका फैसला अदालत मामले के आधार पर करेगी।
विधेयक की सबसे खास बात यह है कि इसमें पत्नी को अधिकार दिया गया है कि वह इस आधार पर तलाक मांग सकती है कि उसका दांपत्य जीवन ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां विवाह कायम रहना नामुमकिन है। विधेयक के मुताबिक पति-पत्नी में तलाक के बावजूद गोद लिए गए बच्चों को भी संपत्ति में उसी तरह का हक होगा, जैसा कि किसी दंपति के खुद के बच्चों को।
विधेयक में यह व्यवस्था भी की गई है कि आपसी सहमति से तलाक का मुकदमा दायर करने के बाद दूसरा पक्ष अदालती कार्यवाही से भाग नहीं सकता। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के तहत अभी व्यभिचार, क्रूरता, परित्याग, धर्मातरण, मानसिक अस्वस्थता, गंभीर कुष्ठ रोग, गंभीर संचारी रोग और सात साल या अधिक समय तक जिंदा या मृत की जानकारी न होने के आधार पर तलाक लिया जा सकता है। स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 27 में भी तलाक के लिए इसी तरह के कारण दिए गए हैं। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी और स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 28 में तलाक की याचिका दायर करने के लिए आपसी सहमति को आधार बनाया गया है।
यदि इस तरह की याचिका को छह से 18 महीने के भीतर वापस नहीं लिया जाता तो कोर्ट आपसी सहमति से तलाक की डिक्री दे सकता है। लेकिन, देखने में आया है कि जो दंपती आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दाखिल करते हैं उनमें कोई एक गायब हो जाता है और मामला लंबे समय तक अदालत में लटका रहता है। इससे तलाक चाहने वाले पक्ष को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। संसदीय समिति ने तलाक के लिए अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को खत्म करने का विरोध किया था। इसे ध्यान में रखते हुए विधेयक में कहा गया है कि यह फैसला अदालत के पास होगा कि वह तलाक के लिए अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि का पालन करवाती है या नहीं।
राज्यसभा में यह विधेयक दो साल पहले पेश किया गया था। वहां से इसे संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था। समिति के सुझावों को शामिल करते हुए विधेयक को फिर कैबिनेट के सामने पेश किया गया था। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इस विधेयक को पास कर दिया गया। अब यह विधेयक संसद में फिर से पेश किया जाएगा। आयु 21 वर्ष और स्‍त्री की आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। यह संशोधन, एक अक्‍टूबर, 1978 से लागू है।
दत्‍तक ग्रहण
यद्यपि गोद लेने का कोई सामान्‍य कानून नहीं है, फिर भी हिंदुओं में हिंदू दत्‍तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 द्वारा तथा कुछ समुदायों में उनकी प्रथा के अनुसार इसकी स्‍वीकृत दी गई है। मुसलमानों, ईसाई और पा‍रसियों में दत्‍तक विधि नहीं है। उन्‍हें इसके लिए संरक्षक और प्रतिपाल्‍य अधिनियम, 1890 के तहत अदालत में जाना पड़ता है। ये तीनों धर्मावलंबी उक्‍त अधिनियम के अधीन पालन-पोषण के लिए ही किसी बच्‍चे को गोद ले स‍कते हैं। ऐसे बच्‍चे वयस्‍‍क हो जाने पर अपने प्रतिपालक से सभी संबंध तोड़ लेने का अधिकार है। ऐसे बच्‍चे को विरासत का कानूनी अधिकार नहीं दिया गया है। जो विदेशी नागरिक भारतीय बच्‍चों को गोद लेना चाहते हैं, उन्‍हें उपर्युक्‍त अधिनियम के अधीन न्‍यायालय में आवेदन करना पड़ता है।
दत्‍तक ग्रहण संबंधी हिंदू कानून को हिंदू दत्‍तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 द्वारा संशोधित और संहिताबद्ध किया गया है जिसके अंतर्गत कानूनी तौर पर सक्षम हिंदू पुरूष या स्‍त्री किसी बालक या बालिका को गोद ले सकता है। पारिवारिक कानून के अन्‍य पहलुओं की भांति किसी अवयस्‍क बालक के संरक्षण के संबंध में कोई समान कानून नहीं है। इसके लिए तीन विभिन्‍न कानूनी पद्धतियां (हिंदू विधि, मुस्लिम विधि और संरक्षक तथा प्रतिपाल्‍य अधिनियम, 1890) प्रचलित हैं। संरक्षक तीन प्रकार के हो सकते हैं- नैसर्गिक संरक्षक, वसीयती संरक्षक और न्‍यायालय द्वारा नियुक्‍त संरक्षक। संरक्षण से जुडे़ नहसंपत्ति। प्राय: दोनों एक ही व्‍यक्ति को नही सौंपी जातीं।
अल्‍पवयस्‍कता और संरक्षकता से संबद्ध हिंदू कानूनों को हिंदू अल्‍पवयस्‍क और संरक्षण अधिनियम,1956 द्वारा संहिताबद्ध किया गया है। असंहिताबद्ध कानून की स्थिति में इसमें भी पिता के श्रेष्‍ठ अधिकार को कायम रखा गया है। इसमें कहा गया है कि बालक 18 वर्ष की आयु तक अवयस्‍क रहता है। पुत्रों और अविवाहित पुत्रियों, दोनो का नैसर्गिक संरक्षक पहले पिता है और इसके बाद माता। पांच वर्ष से कम आयु के बच्‍चों की संरक्षकता के मामले में ही मां का अधिकार प्रथम माना गया है। अवैध बच्‍चों के मामले में मां को कथित पिता से बेहतर अधिकार प्राप्‍त हैं। इस अधिनियम के अनुसार, बच्‍चे के शरीर और उसकी संपत्ति में कोई अंतर नहीं रखा गया है। अत: संरक्षकता का अभिप्राय इन दोनों पर नियंत्रण है।
मुस्लिम कानून में पिता को प्रधानता दी गई है। इसके अंतर्गत संरक्षक और अभिरक्षक में भी अंतर किया गया है। संरक्षक का संबंध प्राय: संपत्ति ‘संपत्ति के संरक्षक’ से होता है। सुन्नियों के अनुसार, यह अधिकार पहले पिता का है, उसकी अनुपस्थिति में उसके निष्‍पादक का है। यदि पिता ने कोई निष्‍पादक नियुक्‍त न‍हीं किया है तो संरक्षक का अधिकार दादा को मिलता है, निष्‍पादक को नहीं। फिर भी दोनों विचारधाराओं के विद्वान इस बात से सहमत नहीं माना जाता।
जहां तक नैसर्गिक संरक्षक के अधिकारों का संबंध है, इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिता का अधिकार संपत्ति और शरीर दोनों पर होता है। अगर अवयस्‍क बालक मां की अभिरक्षा में है तो भी देखभाल और नियंत्रण का सामान्‍य अधिकार पिता को प्राप्‍त रहता है किंतु पिता की मृत्‍यु के बाद मां को संरक्षक नियुक्‍त किया जा सकता है। इस प्रकार भले ही मां को नैसर्गिक संरक्षक के रूप में मान्‍यता प्राप्‍त न हो, फिर भी पिता की वसीयत के अंतर्गत उसे संरक्षक नियुक्‍त किए जाने को लेकर कोई आपत्ति नहीं है।
मुस्लिम कानून के अनुसार, अवयस्‍क बालक की अभिरक्षा (हिजानत) का पूरा अधिकार मां को है। पिता भी इस अधिकार से उसे वंचित नहीं कर सकता। अनाचार के आधार पर मां को इस अधिकार से वंचित किया जा सकता है। किस आयु में मां का अभिरक्षण समाप्‍त हो जाता है, इस बारे में शिया संप्रदाय का मत है कि हिजानत पर मां का अधिकार केवल स्‍तनपान कराने की अवधि तक होता है। अत: बच्‍चे की दो वर्ष की आयु होने पर उसका यह अधिकार तब तक रहता है, जब तक लड़की सात वर्ष की न हो जाए जबकि हनफी विचार के अनुसार, उसे यह अधिकार लड़की की किशोरावस्‍था आरंभ होने तक प्राप्‍त रहता है।
संरक्षकों और प्रतिपालकों के बारे में सामान्‍य कानून संरक्षक और प्रतिपालक अधिनियम, 1890 में उल्लिखित हैं। इसमें स्‍पष्‍ट क‍र दिया गया है कि पिता का अधिकार प्रधान है और संरक्षक या प्रतिपालक के रूप में अन्‍य कोई व्‍यक्ति तब तक नियुक्‍त नहीं किया जा सकता, जब तक पिता अयोग्‍य न पाया जाए। अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि न्‍यायालय को इस अधिनियम के अनुसार, संरक्षक नियुक्‍त करते समय बच्‍चे की भलाई को ध्‍यान में रखना चाहिए।
भरण-पोषण
अपनी पत्‍नी के भरण-पोषण की पति की जिम्‍मेदारी विवाह से संपन्‍न होती है। भरण-पोषण का अधिकार वैयक्तिक कानून के तहत आता है।
अपराध दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का दो) के अनुसार, गुजारा (निर्वहन) का अधिकार पत्‍नी और आश्रित संतानों को ही नहीं, अपितु निर्धन माता-पिता और तलाकशुदा पत्नियों को भी दिया गया है। परंतु पत्‍नी आदि का दावा पति के पास उपलब्‍ध साधन पर निर्भर करता है। सभी आश्रित व्‍यक्तियों के भरण-पोषण का दावा 500 रूपए प्रतिमाह तक सीमित रखा गया है, किंतु अपराध दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2001 (2001 का 50वां) के अनुसार, यह सीमा हटा दी गई है। इस संहिता के अंतर्गत भरण-पोषण के अधिकार को शामिल करने से बड़ा लाभ यह हुआ है कि भरण-पोषण की राशि जल्‍दी और कम खर्च में मिलने लगी है। वे तलाकशुदा पत्नियां, जिन्‍हें परंपरागत वैयक्तिक कानून के अंतंर्गत गुजारा राशि मिलती है, दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण की राशि पाने की अधिकारिणी नहीं हैं।
हिंदू कानून के अनुसार, पत्‍नी को अपने पति से भरण पोषण प्राप्‍त करने का पूर्ण अधिकार है लेकिन अगर वह पतिव्रता नहीं रहती हैं, तो वह अपने इस अधिकार से वंचित हो जाती हैं। भरण पोषण का उसका अधिकार हिंदू दत्‍तक ग्रहण और भरण पोषण अधिनियम, 1956 में संहिताबद्ध है। भरण पोषण की रकम निर्धारित करते समय न्‍यायालय अनेक बातों को ध्‍यान में रखता है, जैसे पिता की आर्थिक स्थिति और देनदारियां। न्‍यायालय इस बात का भी निर्णय करता है कि पत्‍नी का पति से पृथक रहना न्‍यायसंगत है या नहीं। न्‍यायसंगत मानने योग्‍य कारण इस अधिनियम में उल्लिखित हैं। मुकदमा चलाने की अवधि के दौरान भरण पोषण, निर्वाह व्‍यय और विवाह संबंधी मुकदमें के खर्च का भी वहन या तो पति द्वारा किया जाएगा या पत्‍नी द्वारा, बशर्ते दूसरे पक्ष, पति या पत्‍नी की कोई स्‍वतंत्र आय न‍हीं हो। स्‍थायी भरण पोषण के भुगतान के बारे में भी यही सिद्धांत लागू होगा।
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के हितों के संरक्षण तथा तलाक संबंधी बातों के लिए मुसलिम महिला (तलाक संबंधी अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 में व्‍यवस्‍था की गई है। इस अधिनियम के तहत मुस्लिम महिलाओं को दूसरी बातों के अलावा ये अधिकार भी प्राप्‍त हैं-
‘इद्दत’ की अ‍वधि के दौरान पूर्वपति के उचित और न्‍यायसंगत निर्वाह भत्‍ता पाने का अधिकार,
यदि तलाक के पहले या बाद जन्‍म लिए बच्‍चों का भरण पोषण तलाकशुदा महिला खुद करती है तो उसके पूर्व पति द्वारा उसे उचित और न्‍यायसंगत निर्वाह भत्‍ता बच्‍चे की जन्‍म की तिथि से दो साल तक मिलेगा,
‘मेहर’ की राशि या स्‍त्री धन, जो भी मुस्लिम कानून के अनुसार, विवाह के अवसर पर या बाद में, पत्‍नी को देने का निश्‍चय हुआ हो, उतनी राशि तलाकशुदा महिला को मिलेगी, और
तलाकशुदा महिला उस पूरी संपत्ति की अधिकारिणी होगी जो विवाह पूर्व, विवाह के समय या विवाह के बाद उसे उसे सगे-संबंधियों, मित्रों या पति के रिश्‍तेदारों ने दी होगी।
इद्दत के बाद अपना भरण पोषण न कर सकने वाली तलाकशुदा मुस्लिम महिला के लिए भी इस कानून में प्रावधान हैं। इसके अनुसार, मजिस्‍ट्रेट ऐसी महिला की संपत्ति के वारिसों को आदेश दे सकता है कि वे उस महिला को उचित और न्‍यायसंगत निर्वाह भत्‍ता दें। ऐसा आदेश देते समय मजिस्‍ट्रेट महिला की आवश्‍यकताओं, उसके विवाहित जीवन के स्‍तर और वारिसों की आय को ध्‍यान में रखेगा। यह निर्वाह भत्‍ता वारिसों द्वारा उसी अनुपात में दिया जाएगा जिस अनुपात में वे उस महिला की संपत्ति के उत्‍तराधिकार बनेंग। वे लोग उसे उस अवधि तक निर्वाह भत्‍ता देते रहेंगे, जितनी अवधि का जिक्र मजिस्‍ट्रेट ने अपने आदेश में किया होगा।
अगर उस महिला के बच्‍चे हैं तो मजिस्‍ट्रेट केवल बच्‍चों को ही निर्वाह भत्‍ता देने के लिए कहेगा, लेकिन बच्‍चों को भत्‍ता न दे सकने की स्थिति में वह तलाकशुदा महिला के माता-पिता आदेश देगा कि वह उसे निर्वाह भत्‍ता दें।
यदि महिला के रिश्‍तेदार न हों या वे महिला का भरण पोषण करने में असमर्थ हों तो मजिस्‍ट्रेट वक्‍फ अधिनियम, 1995 की धारा 13 के तहत उचित निर्वाह भत्‍ता देने का आदेश उस महिला से संबंधित राज्‍य के वक्‍फ बोर्ड को देगा।
पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 में पत्‍नी को मुकदमे के दौरान गुजारा भत्‍ता एवं स्‍थायी गुजारा भत्‍ता देने का प्रावधान है। जिस अवधि के दौरान विवाह से संबंधित मुकदमा न्‍यायालय में चलता है उसके लिए न्‍यायालय पत्‍नी को अधिकतम रकम जोकि पति की शुद्ध आय का पांचवा भाग तक होती है, दिला सकता है। न्‍यायालय स्‍थायी भरण पोषण की राशि तय करने के दौरान पति की उचित भुगतान क्षमता, पत्‍नी की अपनी संपत्ति और दोनों पक्षों के आचरण को ध्‍यान में रखेगा। यह आदेश तब तक लागू रहेगा, जब तक पत्‍नी पतिव्रता रहती है और दूसरी शादी‍ नहीं करती।
ईसाई महिलाओं के भरण पोषण के अधिकारों के बारे में भारतीय तलाक अधिनियम,1869 में प्रावधान किए गए हैं। इस कानून मे वैसे ही प्रावधान हैं जैसे पारसी कानून के अंतर्गत हैं। भरण पोषण, मुकदमे के दौरान निर्वाह व्‍यय एवं स्‍थायी निर्वाह व्‍यय- दोनों को स्‍वीकृत करते समय भी पारसी कानून की सारी बातों को ध्‍यान में रखा जाता है।
उत्‍तराधिकार
वर्ष 1925 में भारतीय उत्‍तराधिकार अधिनियम बनाया गया था। इस अधिनियम का उद्देश्‍य उन सभी कानूनों को समन्वित करना था, जो उस समय अस्तित्‍व में थे। मुसलमानों और हिंदुओं के उत्‍तराधिकार के विषय में लागू होने वाले कानूनों को इस अधिनियम से अलग रखा गया था। उत्‍तराधिकार संबंधी कानूनों को समन्वित करते समय दो स्‍पष्‍ट योजनाओं को अपनाया गया। पहला भारतीय ईसाइयों, यहूदियों और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन विवाहित व्‍यक्तियों के संपत्ति- उत्‍तराधिकार के बारे में और दूसरा पारसियों के उत्‍तराधिकार संबंधी अधिकारों के बारे में।
पहली योजना में, अर्थात उन लोगों के संदर्भ में जो पारसी नहीं हैं, प्रावधान था कि अगर किसी व्‍यक्ति की मृत्‍यु वसीयत लिखने से पहले हो जाती है और उसकी विधवा एवं उसके खानदान के लोग जीवित हैं तो विधवा पति की एक तिहाई संपत्ति के निश्चित भाग की अधि‍कारिणी होगी और बाकी उत्‍तराधिकारी बचे हुए दो तिहाई भाग के अधिकारी होंगे। विधवा के अधिकारों को बेहतर बनाने के लिए इस कानून में संशोधन किया गया और उसमें बाद में प्रावधान किया गया कि जिस व्‍यक्ति की मृत्‍यु बिना वसीयत लिखे हो जाती है, उसकी विधवा जीवित हो, खानदान में कोई न हो और संपत्ति का शुद्ध मूल्‍य 5000 रूपए से अधिक न हो तो वह पूरी संपत्ति की अधिकारिणी होगी। यदि संपत्ति का मूल्‍य 5000 रूपये से अधिक होगा तो वह 5000 रूपए पर चार प्रतिशत ब्‍याज की अधिकारिणी होगी और शेष संपत्ति में वह अपने भाग की अधिकारिणी होगी। यह अधिनियम किसी व्‍यक्ति पर अपनी संपत्ति की वसीयत करने के मामले में कोई प्रतिबंध नहीं लगाता।
उस कानून की दूसरी योजना में पारसी बेवसीयती उत्‍तराधिकार के लिए प्रावधानप है। भारतीय उत्‍तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 1991 (1991 का 51 वां) द्वारा उक्‍त अधिनियम को इस प्रकार संशोधित किया गया है कि पुत्रों और पुत्रियों- दोनों को अपने पिता अथवा माता की संपत्ति का समान हिस्‍सा मिले। इसमें यह भी प्रावधान है कि पारसी अपनी संपत्ति धार्मिक या दान संबंधी कार्यों के लिए दे स‍कते हैं। इस पर कोई रोक नहीं है। इस कानून के अनुसार, जब कोई पारसी वसीयत किए बिना अपने पीछे विधवा/विधुर और बच्‍चे छोड़कर मर जाता/जाती है तो संपत्ति इस प्रकार वितरित की जाएगी कि विधवा/विधुर और हर बच्‍चे को समान हिस्‍सा मिले। इसके अतिरिक्‍त अगर किसी पारसी की मृत्‍यु अपने बच्‍चों और विधवा/विधुर के अतिरिक्‍त अपने पीछे माता या पिता या माता-पिता, दोनों को छोड़ जाने की स्थिति में हो जाती है तो माता या पिता या दोनों ब‍च्‍चे के हिस्‍से का आधा भाग मिलेगा।
इस कानून में भारतीय उत्‍तराधिकार (संशोधन) कानून 2002 द्वारा संशोधन किया गया है। ऐसा महसूस किया जा रहा है कि इस कानून की धारा 32 में विधवाओं के प्रति भेदभाव किया जाता है। इस भेदभाव को दूर करने के लिए धारा 32 में वर्णित उपबंध हटा दिया गया है। इस संशोधित कानून द्वारा धारा 213 में भी संशोधन कर ईसाइयों को दूसरे धर्मावलंबियों के समान कर दिया गया है।
बेवसीयत हिंदू संपत्ति के बारे में हिंदू उत्‍तराधिकार अधिनियम, 1956 (1956 का 30वां) को संहिताबद्ध किया गया है। यह जम्‍मू और कश्‍मीर को छोडकर पूरे देश में लागू है। इस कानून की यह विशेषता है कि अगर किसी व्‍यक्ति की बिना वसीयत लिखे मृत्‍यु हो जाती है तो इसमें महिलाओं को भी पुरूषों के समान उसकी संपत्ति के उत्‍तराधिकार का अधिकार दिया गया है।
भारत में अधिसंख्‍य मुसलमान सुन्‍नी कानून के हनफी सिद्धांत को मानते हैं। अदालतें भी यह मानती हैं कि अगर इसके विपरीत कुछ नहीं कहा गया तो हनफी कानून ही लागू होगा। हालांकि शिया और सुन्‍नी कानून के सिद्धांतों में बहुत समानता है लेकिन कुछ मतभेद भी हैं। सुन्‍नी कानून कुरान के उत्‍तराधिकार की आयतों को इस्‍लाम के पहले के रीति-रिवाजों के अनुरूप मानता है और पुरूषों को प्रमुखता देता है। हिंदू और ईसाई कानून के विपरीत मुसलिम कानून वसीयत लिखने पर प्रतिबंध लगाता है। कोई मुसलमान अपनी संपत्ति का एक तिहाई भाग वसीयत में दे सकता है।
वह अपने उत्‍तराधिकारियों की सहमति के बिना वसीयत लिखकर किसी अनजान व्‍यक्ति को भी अपनी संपत्ति का एक तिहाई भाग दे सकता है। लेकिन अपने एक उत्‍तराधिकारी को अन्‍य उत्‍तराधिकारियों की सहमति के बिना वह कुछ देगा, वह कानूनी रूप से मान्‍य नहीं होगा। वसीयत पर उत्‍तराधिकारियों की सहमति होने पर भी वसीयत लिखने वाले की मृत्‍यु होने के बाद मुकरा जा सकता है। शिया कानून के अनुसार, संपत्ति का एक तिहाई भाग वसीयत द्वारा किसी को भी दिया जा सकता है।
नए तलाक कानून से बदल सकते हैं रिश्ते
महिला सशक्तीकरण के लिए पिछले कुछ दशकों में कई कानून बनाए गए हैं। पहला क्रांतिकरी कदम 1955-56 में उठाया गया, जब हिंदू विवाह अधिनियम में महिला को पुरुष के समकक्ष रखा गया और पैतृक संपत्ति में भी उसे थोड़ा हक दिया गया। फिर 1980 के दशक से और कई कानून बनाए गए।
अब केंद्र सरकार ने तलाक को सरल बनाने एवं स्त्रियों को पतियों की जायदाद में हक दिलाने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 तथा विशेष विवाह अधिनियम, 1955 में संशोधन करने का निर्णय किया है। चार अगस्त, 2010 को तत्कालीन विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने विवाह अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2010 लोकसभा में पेश किया था। विधेयक को कार्मिक, जन शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति को सौंप दिया गया, जिसने अपनी अनुशंसा दे दी है। सरकार के मंत्री समूह ने उसे स्वीकार भी कर लिया है। संभावना है कि संसद के मानसून सत्र में इसे पेश किया जाएगा।
प्रस्तावित संशोधनों में एक प्रमुख प्रावधान यह है कि पति या पत्नी कोई भी इस आधार पर तलाक की अर्जी दे सकता है कि उसकी शादी अंतिम रूप से टूट गई है। इसके लिए दोनों को याचिका दायर करने से पहले कम से कम तीन वर्षों तक अलग-अलग रहना पड़ेगा।
पत्नी को अधिकार दिया गया है कि वह इस आधार पर तलाक का विरोध कर सकती है कि शादी खत्म होने से उसे आर्थिक संकट हो सकता है। अदालत को देखना होगा कि बच्चों के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रबंध किया गया है। विधेयक में एक नया प्रवाधान जोड़ा गया है कि पत्नी को पति की पैतृक संपत्ति में भी हिस्सा दिया जाएगा और यदि उसका विभाजन संभव न हो, तो उसमें पति के हिस्से का मूल्यांकन कर उसे भरपूर मुआवजा दिया जाएगा।
इस प्रावधान का विरोध भी शुरू हो गया है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भी पहले इसका विरोध किया था, हालांकि बाद में उसने अपना पक्ष बदल दिया। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि ऐसा हक देने से तलाक के मामले बढ़ेंगे, जिससे भारतीय परिवार व्यवस्था के परंपरागत मूल्य प्रभावित होंगे।
कई प्रतिष्ठित महिलाओं ने भी इसे आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला बताया है। उनका मत है कि जोर आर्थिक आत्म-निर्भरता पर होना चाहिए। दूसरा पक्ष यह है कि पत्नी के सहयोग से ही पति धन कमा पाता है। वह घर संभालती है, इसलिए पति बाहर निकल कर स्वच्छंद भाव से काम कर पाता है। परंतु इस कमाई में पत्नी के योगदान को अक्सर नजरंदाज किया जाता है।
यह तर्क अकाट्य है। परंतु यह लागू होता है पति द्वारा अर्जित संपत्ति पर। उसकी पैतृक संपत्ति में पत्नी का योगदान भला कहां से हो गया?
महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए पिता की संपत्ति में पहले ही उन्हें भाई के बराबर अधिकार दिया जा चुका है। हालांकि इससे भी काफी विवाद बढ़ा है। एक सच्चाई जरूर है कि तलाक की स्थिति में अकसर पति यही दलील देता है कि उसके पास कुछ भी संपत्ति नहीं है। यदि पति असंगठित क्षेत्र में काम करता है, तो उसकी आमदनी का सही-सही पता लगाना भी मुश्किल है।
प्रस्तावित कानून का एक और विवादास्पद पहलू यह है कि जहां पत्नी आर्थिक संकट के आधार पर तलाक का विरोध कर सकती है, वहीं ऐसा अधिकार पति को नहीं दिया गया है। इसके अलावा यदि पति तलाक की याचिका दायर करता है, तो उस पर दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा आदि के कई झूठे मामले ठोंक दिए जाते हैं, जिसमें पति के अलावा उसके सारे रिश्तेदार भी जेल की सीखचों के भीतर चले जाते हैं, जिनमें उसकी मां तथा बहन भी होती हैं। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब पति पर झूठे आरोप लगाकर मुकादमा ठोंका गया।
इसका तात्पर्य यह नहीं कि स्त्रियों का शोषण नहीं होता है। शताब्दियों से उनका शोषण होता आया है और आज भी शिक्षित और अशिक्षित, दोनों तरह की महिलाएं पति के जुल्म का शिकार हो रही हैं। परंतु समाधान समस्या से भी बदतर साबित हो रहा है।
स्त्री-पुरुष का रिश्ता बड़ा सम्मोहक होता है। दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। किंतु इस सम्मोहक संबंध को केवल आर्थिक आयाम देकर कानून के जरिये सभी समस्याओं का हल ढूंढने की कोशिश की जा रही है।

अब पति की संपत्ति में तलाक के बाद भी हक